Poet Ehasan who lost both hands earns income by driving autorickshaw

poetsRanchi: This autorickshaw driver is unique since he entertains passegers with poetry. This Ehasan who lost both hands, but did not lose courage. Now, he earns income by driving autorickshaw,

Both of Ehsan’s hands were cut when he was studying in class ninth. When grown up, no one gave him employment. As a last resort, he decided to drive autorickshaw. He worked hard to practice driving with cut hands and became successful in it.

Initially, no passenger wanted to sit in his auto. But gradually, he was able to get passengers. At present, he runs autorickshaws of others and plans to purchase his own.

 

रांची. कहते हैं कि हौसले बुलंद हो तो मंजिल तक का सफर और भी आसान हो जाता है। इसी हौसले की उड़ान को सच करके दिखाया रांची के एहसान अंसारी ने। उनके जज्बे को हर कोई सलाम करता है। दरअसल, एहसान के दोनों हाथ छोटी उम्र में ही कट गए थे। वे कोई भी काम नहीं कर पाते थे। जिंदगी एहसान के लिए बोझ बन गई थी। लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी और रांची की सड़कों पर ऑटो चलाने लगे। शायरी लिखने के भी शौकीन हैं एहसान...

– बता दें कि एक हादसे में एहसान का दोनों हाथ कट गया था। वे उस वक्त 9वीं क्लास में पढ़ाई कर रहे थे।

– इसके बाद उनका स्कूल जाना बंद हो गया। वे कोई भी काम नहीं कर पाते थे। कई महीनों तक एहसान को हॉस्पिटल में रहना पड़ा।

– फैमिली के लिए भी वे बोझ बनते जा रहे थे। उन्हें अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा था।

– लेकिन, एहसान ने जिंदगी से हार नहीं मानी। वे कटे हाथों से ही काम करने की कोशिश करने लगे।

– एहसान ने कहा कि कोई भी उन्हें काम देना नहीं चाहता था। कई साल तक रांची में उन्हें काम नहीं मिला।

– फिर, उन्होंने ऑटो चलाने की सोची। महीनों तक प्रैक्टिस करने के बाद उनकी मेहनत रंग लाई।

– एहसान ऑटो चलाना सीख गए। वे रांची की सड़कों पर ऑटो चलाकर कमाई करने लगे।

– बता दें कि शुरुआत में उनकी ऑटो में कोई पैसेंजर कटे हुए हाथ देखकर बैठना नहीं चाहता था।

– लेकिन, धीरे-धीरे लोग एहसान की मेहनत का कद्र करने लगे और उनकी ऑटो में बैठने लगे।

– एहसान की एक और खूबी है। वे शायरी लिखने के भी शौकीन हैं। कई रेगुलर पैसेंजर तो उनकी शायरी के लिए ऑटो में बैठते हैं।

एहसान की अलग ही पहचान है

– एहसान हर रोज ऑटो चलाकर करीब 200 से 300 रुपए कमा पाते हैं।

– हाथ नहीं होने के कारण पैसेंजर्स से किराया लेने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

– उनके बच्चे भी अब ऑटो में सवार रहते हैं। वे पैसेंजर्स से पैसे लेकर पिता को देते हैं।

– एहसान के ऑटो पर बैठनेवाले रेगुलर पैसेंजर उनकी मेहनत की काफी तारिफ करते हैं।

– वे रांची के जिन सड़कों पर ऑटो चलाते हैं। वहां ‘एहसान चाचा’ के नाम से मशहूर हो गए हैं।

मदद के नाम पर 600 रुपए

– सरकारी सहयोग के नाम पर विकलांग कोटा से 600 रुपए हर महीने मिलता है।

– एहसान भाड़े का ऑटो चलाते हैं। उनकी इच्छा सरकार से विकलांग अनुदान के जरिए एक ऑटो लेने का है।

– वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। लेकिन, पैसे के अभाव में सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हैं।

– बच्चे जब स्कूल से वापस आने के बाद एहसान ऑटो लेकर निकल पड़ते हैं।

رانچی. کہتے ہیں کہ حوصلے بلند ہو تو منزل تک کا سفر بھی آسان ہو جاتا ہے. اسی تازہ پرواز کو سچ کر دکھایا رانچی کے حق انصاری نے. ان جذبے کو ہر کوئی سلام کرتا ہے. دراصل، احسان کے دونوں ہاتھ چھوٹی عمر میں ہی کٹ گئے تھے. وہ کوئی بھی کام نہیں کر پاتے تھے. زندگی احسان کے لئے بوجھ بن گئی تھی. لیکن، انہوں نے ہار نہیں مانی اور رانچی کی سڑکوں پر آٹو چلانے لگے. شاعری لکھنے کے بھی شوق ہے احسان …
– بتا دیں کہ ایک حادثے میں احسان کا دونوں ہاتھ کٹ گیا تھا. وہ اس وقت 9 ویں کلاس میں تعلیم حاصل کر رہے تھے.
– اس کے بعد ان کا اسکول جانا بند ہو گیا. وہ کوئی بھی کام نہیں کر پاتے تھے. کئی ماہ تک احسان کو اسپتال میں رہنا پڑا.
– فیملی کے لئے بھی وہ بوجھ بنتے جا رہے تھے. انہیں اپنا مستقبل تاریکی میں دکھائی دے رہا تھا.
– لیکن، احسان نے زندگی سے ہار نہیں مانی. وہ کٹے ہاتھوں سے ہی کام کرنے کی کوشش کرنے لگے.
– احسان نے کہا کہ کوئی بھی ان کے کام دینا نہیں چاہتا تھا. کئی سال تک رانچی میں ان کے کام نہیں ملا.
– پھر، انہوں نے آٹو رن کی سوچی. مہینوں تک پریکٹس کرنے کے بعد ان کی محنت رنگ لائی.
– احسان آٹو چلانا سیکھ گئے. وہ رانچی کی سڑکوں پر آٹو چلا کر کمائی کرنے لگے.
– بتا دیں کہ شروع میں ان کی آٹو میں کوئی مسافر کٹے ہوئے ہاتھ دیکھ کر بیٹھنا نہیں چاہتا تھا.
– لیکن، آہستہ آہستہ لوگ احسان کی محنت کا قدر کرنے لگے اور ان کی آٹو میں بیٹھنے لگے.
– احسان کی ایک اور خوبی ہے. وہ شاعری لکھنے کے بھی پسند ہیں. بہت ریگولر مسافر تو ان کی شاعری کے لئے آٹو میں بیٹھتے ہیں.
احسان کی الگ ہی شناخت ہے
– احسان ہر روز آٹو چلا کر تقریبا 200 سے 300 روپے کما پاتے ہیں.
– ہاتھ نہیں ہونے کی وجہ سے پےسےجرس کرایہ لینے میں مشکلات کا سامنا کرنا پڑتا ہے.
– ان کے بچے بھی اب آٹو میں سوار رہتے ہیں. وہ پےسےجرس سے پیسے لے کر باپ کو دیتے ہیں.
– احسان کے آٹو پر بیٹھنے ریگولر مسافر ان کی محنت کی کافی تارپھ کرتے ہیں.
– وہ رانچی کے جن سڑکوں پر آٹو چلاتے ہیں. وہاں ‘احسان چچا’ کے نام سے مشہور ہو گئے ہیں.
مدد کے نام پر 600 روپے
– سرکاری تعاون کے نام پر معذور کوٹہ سے 600 روپے ہر ماہ ملتا ہے.
– احسان نقل کی آٹو چلاتے ہیں. ان کی خواہش حکومت سے معذور گرانٹ کے ذریعے ایک آٹو لینے کا ہے.
– وہ اپنے بچوں کو پرائیویٹ اسکول میں پڑھانا چاہتے ہیں. لیکن، پیسے کی غیر موجودگی میں سرکاری اسکول میں پڑھا رہے ہیں.
– بچے جب اسکول سے واپس آنے کے بعد احسان آٹو لے کر نکل پڑتے ہیں.

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