दुनिया के 32 शायरों के मुस्लिम सलीम को 55 शेरी नज़राने

दुनिया के 32 शायरों के मुस्लिम सलीम को 55 शेरी नज़राने

1.

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

वक़्त की आवाज़ हैं मुस्लिम सलीम

शायर-ए-मुमताज़ हैं मुस्लिम सलीम

जांफज़ा हे उनका तखलीक़ी शऊर

साहिब-ए-एजाज़ हैं मुस्लिम सलीम

2

तनवीर फूल, न्यूयार्क

नग़्मा-ए-तेहनियत हे हर लब पर

भाई मुस्लिम सलीम दीदा-वर

खुश-नवा, खुश-अदा, बहुत मुख़लिस

आसमान-ए-अदब पे मिस्ल-ए-क़मर

देख लो वेबसाएट उर्दू की

भाई मुस्लिम का ख़ूब है यह हुनर

नूर फैलाते हैं अदब का सदा

दाद देते हैं सारे अह्ल-ए-नज़र

उनकी तहरीर हे बहुत आला

उनका तर्ज़-ए-सुखन रहे गा अमर

क्या षगुफ़्ता मिज़ाज है उनका

दिल हे उनका महब्बतों का नगर

ज़ात में अपनी अंजुमन हैं यह

करते हैं ख़ूब यह दिलों में घर

हक परस्ती, खुलूस और उल्फ़त

उन से मामूर उनके क़ल्ब-ओ-जिगर

ज़िन्दादिल, कुहना-मशक और खु़षगो

जारी बरसों से है अदब का सफ़र

दिल से उनका कलाम पढ़िए अगर

उनकी तहरीर में निहां है असर

उनका पैग़ाम अज़्मत-ए-इन्सां

उनके अशआर हैं उरूज-ए-बशर

बज़्म-ए-उर्दू के हर ख़जाने में

उनकी तहरीर मिस्ल-ए-लाल-ओ-गुहर

उसमें इन्सानियत का दर्द भी है

सोज़-ए-दिल का निहां हे उसमें असर

नाम मषहूर हिन्दो-पाक में हे

मिस्ल-ए-महताब उनकी राहगुज़र

उनसे शादाब गुलशन-ए-अशआर

फूल सरसब्ज़ हे अदब का शजर

3

नज़्र-ए-मुस्लिम सलीम। सरवत जै़दी भोपाली

शेर-ओ-सुख़न के ताज हैं दिल के अमीर हैं

लफ़्जों की अंजुमन में उनीस-ओ-दबीर हैं

ग़ालिब नवाज़ क़ौम ने एैलान कर दिया

मुस्लिम सलीम उर्दू घराने के मीर हैं

4

नज़्र-ए-मुस्लिम सलीम। सईद खां चराग़ श्यिोपोरवी

अहल-ए-खि़रद के दिलबर मुस्लिम सलीम साहिब

ईसार के समंदर मुस्लिम सलीम साहिब

नेमत क़लम की दी हे तोहफे में उनको रब ने

करते हैं राज दिल पर मुस्लिम सलीम साहिब

5

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

शायर-ए-खु़षफ़ि-ओ-खु़ष गुफ़्तार हैं मुस्लिम सलीम

अह्ल-ए-दानिश के मुईन-ओ-यार हैं मुस्लिम सलीम

आमद-आमद से अयां है उनका हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न

अंदलीब-ए-गुलशन-ए-गुफ़्तार हैं मुस्लिम सलीम

6

हारिस बिलाल, सरगोधा, पाकिस्तान

शायरी का नाज़ हैं मुस्लिम सलीम

शेर की परवाज़ हैं मुस्लिम सलीम

उनके सब मजमूं तबीअत से करीब

ज़िन्दगी का साज़ हैं मुस्लिम सलीम

रंग शेरों में गुलों के भरते हें

शायर-ए-गुलसाज़ हैं मुस्लिम सलीम

बात करते हैं खरी और जानदार

इक निडर आवाज़ हैं मुस्लिम सलीम

लोग हारिस कहने पर मजबूर हें

अस्र का एज़ाज़ हैं मुस्लिम सलीम

7

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

आमद-आमद है यह असरी आगही से हमकिनार

एक सहाफ़ी के क़लम का है जो अदबी शाहकार

नाम हे मुस्लिम सलीम और शख्सियत

तारीख़-साज़

कारनामे जिन के हैं वेबसाएटों से आशकार

देख कर वेबसाएटें खुद राए क़ायम कीजिए

इल्म का माहौल हे जिन की वजह से खुशगवार

उर्दू शोरा ओर अदीबों पर हे जो डाएरेकटरी

अह्ल-ए-दानिष के लिए हे बाइस-ंए-सद इफ़्तिख़ार

खिदमत-ंए-उर्दू है उनका एक फितरी मशग़ला

है सितम दीदा दिलों की शयरी उनकी पुकार

मज़हर-ंए-सोज-ंए-दुरूुं है उनका मेयारी कलाम

हे जहान-ंए-फ़िक्र-ओ-फ़न में जिस को हासिल ऐतबार

हैं यह रशहात-ंए-क़लम असरी अदब का आइना

सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िन्दगी बर्क़ी हे जिन से आशकार

8

फै़सल नवाज़, लंदन

जिस तरह दर्द को होंटों से सदा मिलती है

उनके शेरों से सितारों को ज़िया मिलती है

नुदरत-ंए-फ़िक्र से ममलू है कलाम-ंए-मुस्लिम

आरज़ूओं की खनक दिल की नवा मिलती है

लोग लब-बसता हों दहशत की फ़िजा में जिस दम

तब ख़यालात को मुस्लिम की सदा मिलती है

मेरी मानो वुह मुआलिज हैं दिमाग़-ओ-दिल के

उनके अषआर से जे़हनों को शफ़ा मिलती है

रुत बहारों की हो या दौर-ए-खिज़ां हो फै़सल

उनके अषआर से जीने की अदा मिलती है

9

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

हैं यह मुस्लिम सलीम के अषआर

उनके ज़ौक़-ए-मुस्लिम के ग़म्माज़

खु़द पढ़ें ओर लगाएं अंदाजा

ज़िन्दगी का है उन में सोज़-ओ-गुदाज़

उनका रंग-ंए-सुख़न तगज़्ज़ुल में

उनकी ताब-ंए-रसां का हे एजाज़

उनके फ़न का है क़द्र-दां बकीऱ्े

हैं यह अषआर वक़्त की आवाज़

10

मजीद ताज बलोच, बलोचिस्तान, पाकिस्तान

हर दल में एहतिराम हे मुस्लिम सलीम का

बे-मिस्ल वुह कलाम हे मुस्लिम सलीम का

हर ज़ावियेे से करता हे खि़दमत अदब की जो

बस एक ही वुह नाम हे मुस्लिम सलीम का

उनको मिला हे विरसे में गंज-ए-सुखनवरी

मषहूर फै़ज़-ए-आम हे मुस्लिम सलीम का

ग़ज़लों में उन की नुदरत-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र भी है

यह बेनज़ीर काम हे मुस्लिम सलीम का

करते हैं रहनुमाई जो उस्ताद की तरह

दिल यह मेरा ग़ुलाम हे मुस्लिम सलीम का

कर दो रक़म यह नाम सुनहरी हरूफ़ से

ऊंचा बहुत मक़ाम हे मुस्लिम सलीम का

ऐ ताज! बादशाह हैं शहर-ए-सुख़न के वह

अब हर ज़बां पर नाम हे मुस्लिम सलीम का

11

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

म्ुाहसिन-ए-उर्दू ज़बां मुस्लिम सलीम

कारनामे जिनके हैं बेहद अज़ीम

उनकी वेबसाएट हे गंज-ए-शाएगां

जिससे है उनका अयां ज़ौक-ए- सलीम

है यह उर्दू के लिए इक नेक फ़ाल

उसकी हे डाएरेकटरी कार-ए-अज़ीम

हे अदीबों का यह नादर तज़किरह

जो अदब की है सिरात-ए-मुसतक़ीम

हो गया दिल देख कर यह बाग़ बाग़

चलती हो जैसे यहां मौज-ए-नसीम

फिक्र-ओ-फ़न है उनका असरी आगही

हैं वुह अह्ल-ए-इल्म-ओ-दानिष के नदीम

12

अहमद अली खां, रियाद, सऊदी अरबयिा(

इल्म-ओ-फ़न की मंजिलों के राहबर मुस्लिम सलीम

साएबान-ए-उर्दू के हैं बाम-ओ-दर मुस्लिम सलीम

महफ़िल-ए-यारां हो या हो फिर कोई बज़्म-ए-सुख़न

होते हैं जलवा फ़िगन मिस्ल-ए-क़मर मुस्लिम सलीम

वुस्अत-ए-इल्म-ओ-अदब का मोतरिफ सारा जहां

बाग़-ए-उर्दू के समर-आवर शजर मुस्लिम सलीम

उनगिनत औसाफ़ हें, अहमद रक़म क्या क्या करे

खु़ष बयान-ओ-खु़षअदा-अदा-ओ-खु़षनज़र मुस्लिम सलीम

13

तारिक़ मुहीउददीन, पटना, बिहार, इन्डिया

इक मीर-ए-कारवां हें, अदब के हैं शहसवार

बाग़-ए-सुख़न हे जिनके सबब आज लालाज़ार

हर सू जहां में चलती हे इनकी ही गुफ़तुगू

फैली हे इनके काम की शुहरत भी चार सू

पोशीदा जो अदब में हे सब होगा बेनक़ाब

अफ़लाक पर हुआ है नमूदार आफ़ताब

उनके ही दर पे मेरी जबीं झुक रही हे क्यूं

कदमों पा उनके जा के नज़र रुक रही हे क्यूं

उर्दू ज़बां में एक धड़कता हुआ हे दिल

गुलहा-ए-रंग-ओ-बू का है शहकार मुस्तिक़िल

अब उनके दर से फै़ज यहां पा रहे हैं हम

अपना नसीब ऐसे भी चमका रहे हैं हम

अफ़कार दिलनशीं हैं, तख़य्युल हे लाजवाब

जिनकी ज़िया से हो गए ज़र्रे भी आफ़ताब

दश्त-ए-जुनू का एक मुसाफिर सफर में हे

मंजिल को हे तलाश, कोई रहगुज़र में हे

मैं ने पढ़ा हे मीर को, गालिब को, ज़ौक़ को

शायर एक और अज़ीम मिला अपने शौक़ को

उनका कलाम राहत-ए-क़ल्ब-ओ-जिगर भी है

गोया कि एक मर्कज़-ए-औज-ए-बशर भी है

उर्दू भी जलवागर है यहां तमकिनत के साथ

सिम्टी हे उनके तर्ज़-ए-निगारिश में काएनात

वुसअत नज़र की माया है ज़हन-ओ-शऊर का

इक मुस्तक़िल जरीआ हे कैफ़-ए-सरूर का

नोक-ए-क़लम से लेते हैं खंजर का काम भी

उर्दू के हक़ में हैं वुह मुजाहिद मुदाम भी

हर शेर बोलता है, ग़ज़ल बोलती हुई

कोई ना कोई राज़-ए-निहां खोलती हुई

उर्दू को फिर से बाख़्शी हे तनवीर या खुदा

उनकी बढ़ा दे और भी तौक़ीर या खुदा

मुस्लिम सलीम आप को दूं में खिराज क्या

तारिक़ सुख़न के कूचे में खुद मैं हूं इक गदा

14

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी, देहली

हैं जो मुस्लिम सलीम के अषआर

बेशतर उन में हैं हसीं शहकार

दिलनशीं है शऊर-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न

हैं वुह अस्र-ए-जदीद के फ़नकार

अपनी उर्दू नवाज़ियों के लिए

दाद-ओ-तहसीन के हैं वुह हक़दार

अह्द-ए-हाजिर में उनका हुस्न-ए-बयां

जौहर-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न का हे इज़हार

क्यूं ना हर दिल अजीज़ हो बर्क़ी

उनकी ग़ज़लों का दिलनशीं मेयार

15

मुहम्मद सिबग़त उल्लाह आरिफ़ी) मुम्बई। इन्डिया(

ऐ सिन्फ़-ए-ग़ज़ल तेरी तौक़ीर बढ़ा दी है

तू और जवां होगी यह उसने दुआ दी है

मसरूफ़ हैॅ हर लमहा वुह खिदमत-ए-उर्दू में

ग़ज़लों के ज़रीए भी यह बात बता दी है

दे दी हे शिकस्त उसने खा़रों भरी वादी को

उर्दू को नई फिर से इक राह दिखा दी है

ऐ आरिफ़ी दोनों ही हैं फ़न की बलंदी पर

वुह मीर हों या मुस्लिम उर्दू को जिला दी है

16

अहमद अली खां, रियाद, सऊदी अरब

हर कस-ओ-ओ-नाकस को कब हासिल हे शुहरत का मक़ाम

खिदमत-ए-उर्दू से पाया है यह अज़मत का मक़ाम

दिल में घर कर लेते हैं एैसा हे इज़्जत का मक़ाम

इस के आगे कुछ नहीं है जाह-ओ-हशमत का मक़ाम

राज करती हे दिलों पर गो नहीं हैं ताज-ओ-तख़्त

कम नहीं शाही से कुछ बेलौस खि़दमत का मक़ाम

फिक्रो-ओ-फ़न इन्सां के छू लेते हैं कैसे आसमां

सोचिए तो फ़िल-हक़ीक़त हे यह हैरत का मक़ाम

मेरी किसमत देखिए हैं रहनुमा मुस्लिम सलीम

में जहां हूं आज अहमद, है सआदत का मक़ाम

17

तारिक़ मुहीउददीन, पटना, बिहार, इन्डिया

कारवान-ए-अदब / पासबान-ए-अदब / दासतान-ए-अदब / तू निशान-ए-अदब

शाइर-ए-नेक नाम / तुझको लाखों सलाम

तेरी तहरीर क्या  / तेरी तक़रीर क्या / तेरी तफ़सीर क्या / तेरी तदबीर क्या

एक कौसर का जाम / शाइर-ए-नेक नाम

तूने रक्खी हे लाज / सर पा उर्दू के ताज / मुहतरम हे तू आज /  पेश हे यह खि़राज

तेरा ऊंचा मक़ाम / शाइर-ए-नेक नाम

शमा बुझती रही / उर्दू लुटती रही / जिसने आवाज़ दी / वह तिरी ज़ात थी

तू मुजाहिद मुदाम / शाइर-ए-नेक नाम

मीर-ए-सानी है तू / रोद-ए-मानी है तू / जाविदानी है तू / इक कहानी है तू

तू ग़ज़ल का इमाम / शाइर-ए-नेक नाम

बा-अक़ीदत जबीं / यूं ही झुकती नहीं / है यह दिल को यक़ीं / ऐ मिरे हमनशीं

कुछ है राज़-ए-दवाम / शाइर-ए-नेक नाम

18

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

एह्द-ए-नौ में सबके मंज़ूर-ए-नज़र मुस्लिम सलीम

नख़्ल-ए-उर्दू के तरोताज़ा समर मुस्लिम सलीम

खिदमत-ए-उर्दू अदब में मुसतक़िल सरगर्म हें

शायर-ओ-नक़्क़ाद अदीब-ओ-दीदावर मुस्लिम सलीम

बनके अरबाब-ए-नज़र के इक अमीर-ए-कारवां

कारवान-ए-शेर के हैं हमसफ़र मुस्लिम सलीम

आके इंटरनेट पा देखें उनके यह 16 ब्लाग

कारनामों से हैं अपने नामवर मुस्लिम सलीम

देख लें खुद आके गूगल सर्च में चाहैं अगर

हैं जहां में आज कितने मुअतबर मुस्लिम सलीम

नब्ज़-ए-दौरां पर निहाएत तेज़ हे उनकी नज़र

जो हैं बेचारा, हैं उन के चारागर मुस्लिम सलीम

रखते हैं सूद-ओ-ज़ियां से हो के बर्क़ी बेनियाज़

अहल-ए-दानिष की जहां भी हो ख़बर मुस्लिम सलीम

19

तारिक़ मुहीउददीन, पटना, बिहार, इन्डिया

यह वक़्त यह ज़माना हे मुस्लिम सलीम का

अब हर तरफ़ फ़साना हे मुस्लिम सलीम का

खं़जर की नोक पर भी यह कहते हे हक़ की बात

हर शेर क़ातिलाना हे मुस्लिम सलीम का

सौदा, ज़फ़र के, जौक के सब मोतरिफ़ हुए

हर शख्स अब दिवाना हे मुस्लिम सलीम का

क़ारी की दिल में सीधी अतरती हे उनकी बात

वुह रंग शायराना हे मुस्लिम सलीम का

तखईल उनकी औज-ए-सुरैया से हे बलंद

इक रंग आरफ़िाना हे मुस्लिम सलीम का

सदके़ ’सलीम वाहिद-ओ-अबदुल हकीम के

इल्म-ओ-अदब घराना हे मुस्लिम सलीम का

तारिक़ को इशतेआक़-ए-मुलाक़ात हे बहुत

मद्दाह ग़ाएबाना हे मुस्लिम सलीम का

।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

१। ’ सलीम वाहिद ﴿ डा. सलीम वाहिद सलीम साहब, वालिद-ए-मोहतरम  मुस्लिम सलीम साहब ओर ”खै़याम-ए-नौ“ के मुसन्निफ़ २ ख़लीफ़ा अबदुल हकीम ﴿ डा. सलीम वाहिद सलीम साहब के चचा और ”फ़िक्र-ए-इकबाल“ व दर्जनों किताबों के लेखक।

़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़

20

अहमद अली खां) रियाद, सऊदी अरबयिा( मुस्लिम सलीम साहब के धार शहर में ऐज़ाज पर नज़राना-ए-अक़ीदत

वुह थामे परचम-ए-उर्दू कहां कहां पहुंचा

अठा भोपाल से, अब धार कारवां पहुंचा

जो देखा धूप में पोधा कोई झुलसते हुए

तो बन के साया-ए-शफ़कत वुह बाग़बां पहुंचा

कमाल-ए-हस्ती है या यह कशिश कलाम की है

कि उनकी बज़्म में हर पीर-ओ-नौजवां पहुंचा

बलन्द इतना हुआ है कद आज मुस्लिम का

जहां ना पहुंचा था कोई वुह अब वहां पहुंचा

21

ज़िया शहज़ाद, कराची

मुस्लिम सलीम साहब के धार शहर में ३ सतमबर 2013 को एज़ाज़ पर

मुस्लिम सलीम आप को करता हों में सलाम

उर्दू को आपने क्या मक़बूल-ए-ख़ास-ओ-आम

परचम ज़बान-ए-उर्दू का थामे जो पहूंचे धार

हर लब पा नाम-ए-उर्दू रहा सुबह और शाम

अल्लाह! ऐसे लोगों को अम्र-ए-खिज़र अता

वुह जिन के दम से उर्दू ने पाए उरूज-ओ-बाम

शहज़ाद आज उर्दू जो ताबिंदा, जिंदा हे

”मुस्लिम“ से लोगों ने ही दिलाया हे यह मक़ाम

22

मुस्लिम सलीम ओर भोपाल

अहमद अली खान अहमद) रियाद, सऊदी अरबयिा(

रूह-परवर हर तरफ़ हे सादगी भोपाल में

चेहरों पर भी हे ग़ज़ब की ताज़गी भोपाल में

लज््जत-ए-उर्दू की ना खलती कमी भोपाल में

मिस्ल-ए-मुस्लिम होता गर हर आदमी भोपाल में

आगरा, देहली, इलहाबाद और शहर-ए-लखनऊ

चलके आई हे मुजस्सम शायरी भोपाल में

करते हैं अपने ब्लागों से वुह तशहीर-ए-अदब

खि़दमत-ए-उर्दू की बहती हे नदी भोपाल में

ढंूढने से भी नहीं मिलता है मुस्लिम का जवाब

है अदब की उनके दम से रौषनी भोपाल में

खु़षनुमा-ओ-खु़ष अदा यह शहर है अहमद अलीे

काश अपनी भी गुज़रती ज़िन्दगी भोपाल में

23

तारिक़ मुहीउददीन, पटना, बिहार, इन्डिया

एक रहबर, इक मुजाहिद आज उर्दू को मिला

मैं तो कहता हों कि बेशक ताज उर्दू को मिला

हर जगह उर्दू ज़बंा को जख़्म ही कारी मिले

इसके हक़ में जो मिले वुह दर के दरबारी मिले

शेर कहना, शेर सुनना और उस पर तबसिरा

रोटियां कुछ सेंक लीं और पेट अपना भर लिया

लड़खड़ाई, गिर पड़ी, संभली, यह गिर कर फिर उठी

सिलसिला चलता रहा, मुरझा गई नाज़ुक कली

उसके सर पर बेतुका बुहतान भी रख्खा गया

उस पे दुशमन की ज़बां कह कर सितम ढाए गये

साजिशों के तीर से फिर उसका दिल छलनी हुआ

ज़ेर-ए-मक़तल इक तमाशा, रक़्स-ए-बिसमिल भी हुआ

हर कदम पर ठोकरें थीं, थे मसाइब भी बड़े

कह रहे थे सब यही दुशवार हैं यह मरहले

हर तरफ़ मायूसियों का छा गया उस पर गहन

इस घटा के बीच अभरी फिर खुशी की इक किरन

और फिर ऐसी सदा अठने लगी भोपाल से

तुम निकालो अब तो इस को साज़िशों के जाल से

आफ़रीं सद आफ़रीं उठता रहा पैहम क़दम

एक जज़्बा, इक जुनूं था साथ उसके दम-बदम

वुह मुजाहिद कौन है टकराए जो तूफ़ान से

हिन्द की सरहद मिलादी जिस ने पाकिस्तान से

उनकी अज़मत को करें झुक कर ज़रा हम भी सलाम

नाम हे मुस्लिम सलीम उनका करें सद एहतिराम

देख लें उनकी इनायत क्येां यहां उर्दू को है

ज़ात एसी मोहतरम क्येां रश्क-ए-जां उर्दू को है

है सरूर-ए-जांफ़ज़ा उनका कलाम-ए-लाजवाब

शायरी उनकी है जेसे दर्द का दरमां जनाब

च्ुास्त है लफ़्ज़ों की बंिदश, है अजब तर्ज़-ए-बयां

मात हैं नोक-ए-कलम के सामने तेग़-ओ-सिनां

फिक्र है सबसे अलग उनकी, अछूता हे कलाम

इसमें कोई शक नहीं ंहे दिल को छूता है कलाम

क्या तखय्युल, क्या यह अंदाज़-ए-बयां है दोसतो!

इफ़ितखार-ओ-नाज़िश-ओ-अह्ल-ए-ज़बां है दोसतो!

इल्म ओर फ़न का अलीगढ़ से उनहैं तोहफा मिला

दरजा-ए-अव्वल से बी ए तक वहीं सीखा पढ़ा

आप इसका भी असर देखेंगे उन की ज़ात में

कौम का ग़म जेसे सैय्यद को था, दिन में रात में

फिर इलहाबाद से अरबी में एम ए भी क्या

अकबर-ओ-इबन-ए-सफी की सरज़मीं पर गुल खिला

नाज़िश-ए-शेरो सुख़न मुस्लिम को लोगों ने कहा

देख लें साइट पे उनकी किस क़दर हे तबसिरा

बज़्म उनके नाम की सजती हे सुबह-ओ-शाम अब

रोक सकती ही नहीं है गर्दशि-ए-अय्याम अब

एक मकतब, इक इदारा इल्म-ओ-दानिष का खुला

ले रहे हैं फै़ज़ उन से देखिए हम बरमला

आपके चर्चे नहीं बस हिंद-ओ-पाकसितान में

तज़किरे होते हैं अब तो चीन में, जापान में

हर इदारे से मिलीं असनाद उनको बेशुमार

शायर-ए-यकता, कहा बेमिस्ल अफ़साना निगार

आपकी खिदमत अदब में हम लिखें तो क्या लिखें

आपके रुतबे, मरातिब जो लिखें थोड़ा लिखें

जिस तरह गुल की चमनबंदी है खुशबू के लिए

दिल धड़कता हे अगर उनका तो उर्दू के लिए

उनकी कोशिश ने दिया उर्दू को हुस्न-ए-लाज़वाल

उनकी खिदमत की अदब में है नहीं कोई मिसाल

आपने शेर-ओ-अदब को, फ़न को जिं़दा कर दिया

हाल सबका अपनी वेब-डाएरेकटरी में लिख दिया

किस क़दर अहसान उनका हम गिनाएं दोसतो

पड़ गए अलफ़ाज कम, कैसे बताएं दोसतो!

24

अव्वल संगरामपुरी, जद्दा, सऊदी अरब

हुस्न-ए-सुख़न में जो यह तिरा इन्ंिसजाम है

शाहिद है कोई भी ना तिरा हम-मक़ाम है

सारे फ़ुसूं निगार यह करते हैं ऐतिराफ़

अब रेख़ते का तू ही जहां में इमाम है

बर्क़-ए-सुख़न है तेरी ज़िया-बार हर तरफ़

दानिष में तेरी मुह्र-ए-सुख़न तेज़गाम है

अह्ल-ए-अदब ने तुझको वुह मंसब अता किया

शेरा को जो नुजूम में हासिल मक़ाम है

तेरे सुख़न की फ़िक्र से हम पर अयां है यह

बाम-ए-फ़लक को चूमता तेरा कलाम है

मुस्लिम सलीम साहिब-ए-कल्ब-ए-सलीम हैं

उनका रुख़-ए-हसीन भी माह-ए-तमाम है

मेरी दुआ है हर कोई हो उससे मुस्तफ़ीज़

उर्दू ज़बां पे आपका जो फ़ैज़-ए-आम है

तेरे मरश्शहात-ए-कलम को हमारा दिल

दस्त-ए-नज़र से चूम के करता सलाम हे

25

ज़िया शहजाद, कराची

तुझपे नाजां हे बहुत हिन्दोस्तां मुस्लिम सलीम

तेरे दम से जिन्ंदा है उर्दू ज़बां मुस्लिम सलीम

तेरा जज़्बा उर्दू की खिदमत-गुज़ारी मरहबा!

काम तेरे किस क़दर हैं बेकरां मुस्लिम सलीम

डा. वाहिद के और उम्मे हबीबा के सपूत

हो गया हे वाक़यी तू जाविदां मुस्लिम सलीम

जन्नतुल फ़िरदौस में भी है मसर्रत का समां

किस कद़र खु़ष हैं वहां दो हस्तियां मुस्लिम सलीम

आबयारी करता है उर्दू की अपने खून से

रात दन उर्दू पे तू है मह्रबां मुस्लिम सलीम

ओढ़ना तेरा बछोना उर्दू ही उर्दू फ़क़त

और है उर्दू फ़क़त तेरा जहां मुस्लिम सलीम

मैं भी हूं शहज़ाद नाजां आज अपने आप पर

दोसत हे मेरा, है मुझ पर मह्रबां मुस्लिम सलीम

26

सल्मान सिद्दीक़, सियालकोट, पाकिस्तान

खि़द्मत-ए-उर्दू है राह-ए-मुस्तक़ीम

इल्म का दरिया हैं, लहजा भी हलीम

शायरी और ज़ात दोनों हैं अज़ीम

मुहतरम वुह दौस्त हैं मुस्लिम सलीम

27

ज़िया शहजाद, कराची

इक धूम इक फ़साना हे मुस्लिम सलीम का

देखो जिसे दिवाना है मुस्लिम सलीम का

हर शख़्स गा रहा है यह उर्दू ज़बान में

उर्दू का यह तराना है मुस्लिम सलीम का

कैसा अजीब शख्स है जादू-असर हे यह

कया ख़ूब आसताना हे मुस्लिम सलीम का

इक बार पढ़ लया था उसे बस ग़ज़ब हुआ

हर लफ़्ज क़ातिलाना हे मुस्लिम सलीम का

मेरे ख़याल व ख़्वाब में कब रोक टोक है

हर रोज़ आना-जाना हे मुस्लिम सलीम का

रखता हूं इत्तिफ़ाक़ मैं तारिक़ की बात से

इल्म-ओ-अदब घराना हे मुस्लिम सलीम का

उर्दू को कर दिया हे ज़माने में रूशनास

शहज़ाद अब ज़माना हे मुस्लिम सलीम का

28

इक़बाल कुरैशी, हज़रो, पंजाब, पाकिस्तान

नाम मुस्लिम सलीम है इनका

इनका शेरी जहां है रश्क-ए-इरम

शेर-गोई में ताक़ हैं हज़रत

क्या खुदा ने दिया हे इनको क़लम

मक्तब-ए-फ़िक्र हैं हमारे लिये

उनसे ही कस्ब-ए-फ़ैज करते हैं हम

आसमान-ए-अदब के चांद हैं वुह

उन पे क़ायम रहे खुदा का करम

29

बाबर शाह रहमान, मियांवाली, पाकिसतान

यह जो मुस्लिम सलीम साहब हें

शेरगोई के फ़न पे ग़ालिब हें

आज कल उनके शेर पढ़ता हूं

देर तक अपने सर को धुनता हूं

30

बाबर इमाम, फुलिया, पाकिसतान

नाम-ए-मुस्लिम हे सबके विर्द-ए-ज़बां

ख़ूब उर्दू में भरते हैं यह रंग

एक इक शेर लाजवाब-ओ-हसीं

शेर गोई का इक अलग हे ढंग

जेसे कोयल की कूक वक्त-ए-सहर

उनके अषआर का है वुह आहंग

31

खुर्शीद उलहसन नय्यर, रियाद, सऊदी अरबिया

इक सबू-ए-महब्बत पिला दीजिए

जिससे दिल नर्म हो वुह अदा दीजिए

जिससे मसरूर हों सारे अह्ल-ए-अदब

बस वुह मुस्लिम के जैसा नशा दीजिए

।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

कया अंदाज़ है और बला की सादगी है। वाह। चार मिसरे आपकी नज़्र कर रहा हों गर कुबूल उफ़्तद।।।।।।

32

माया-ए-नाज़ शायर और सहाफ़ी जनाब जिया शहजाद) कराची( का मुस्लिम सलीम पर एक और करम) ६ मार्च 2016

इक सहाफ़ी और शायर, माहिर-ए-लिस्सानियात

नाम हे मुस्लिम सलीम ओर फख्र-ए-हिंदुसतान हैं

मर्द हैं मैदान के, पीछे कभी हटते नहीं

हाथ में परचम लिए उर्दू ज़बां की शान हें

33

कामिल जनेटवी, चंदोसी इंडिया

मोतरफि हे ज़माना मुस्लिम का

यह फ़साना नहीं, हक़ीक़ीत है

।।।।।

सच हे यह कामिल कि शहर-ए-इल्म में

वक़्त की आवाज़ हैं मुस्लिम सलीम

34

फै़सल नवाज़, लंदन

वाह कैसी ज़बां पे कुदरत है

जिसके बाइस ग़ज़ल में नुदरत है

35

नासिर फीराज़ाबादी

दोस्ती का भी अलग अंदाज़ हैं मुस्लिम सलीम

हां मिरे हमराज़ और दमसाज़ हैं मुस्लिम सलीम

36

ज़िया शादानी, मुरादाबाद

दर हक़ीकत अहल-ए-फ़न की जान हैं मुस्लिम सलीम

खिदमत-ए-उर्दू का इक एैलान हैं मुस्लिम सलीम

37

नदीम अख़्तर नदीम मांगनावी, लंदन, इंगलेंड

उर्दू में एक नाम हे मुस्लिम सलीम का

जिद्दत ग़ज़ल में काम है मुस्लिम सलीम का

38

सईद खां चराग़ शिवपोरवी

अह्ल-ए-खि़रद के दिलबर मुस्लिम सलीम साहिब

ईसार के समन्दर मुस्लिम सलीम साहिब

नेमत क़लम की दी हे तोहफ़े में जिनको रब ने

करते हैं राज दल पर मुस्लिम सलीम साहिब

39

इस्माईल उस्मानी नज़र इलाहाबाद युनिवर्स्टिी इलाहाबाद

ऐसी कुछ बात है मुस्लिम में कि लिखता हे नज़र

उनके हर शेर ने इन्सान को ताकत दी हे

34

ज़रीना खान, रामपुर

आपके दिल को खुदा ने वुह तहारत दी हे

संग भी जिससे बिखर जाए वुह ताकत दी हे

41

ज़हीना स्द्दिीकी, देहली

यह एक हक़ीक़त हे तस्लीम करे दुनिया

मुस्लिम के तग़ज़्ज़ुल की ताज़ीम करे दुनिया

़ध्ध्ध्ध्ध्ध्ध्ध्

42

ज़्ाहीना स्द्दिीकी, देहली

एडीटर फिक्र-ए-नौ, लाहौर जनाब मसूद तन्हा ओर मुसतनद सहाफी ओर शायर जनाब ज़िया शहजाद, कराची के मुस्लिम सलीम पर क़ताआत से

मुताअस्सिर हो कर चंद अशआर पेश-ए-खिदमत हें।

फख़्र-ए-हिन्दुस्तान है मुस्लिम सलीम

उर्दू पर कु़र्बान है मुस्लिम सलीम

आलमी शुहरत का भी हामिल है वह

फेसबुक की जान है मुस्लिम सलीम

खू़बियां उसकी फरिशतों जैसी हैं

गो कि इक इन्सान हे मुस्लिम सलीम

उसको विरसे में मिली हे शायरी

साहिब-ए-दीवान है मुस्लिम सलीम

ऐ ज़हीना इल्म ओर इदराक की

आन, बान ओर शान हे मुस्लिम सलीम

43

अहमद साहिर, ओरंगाबाद, महाराशट्र

उनका इक इक शेर हे ज़र्ब-ए-कलीम

हैं शहंशाह-ए-सुख़न मुस्लिम सलीम

44

मुमताज़ अली, इन्गलेंड

मरहबा! रौशनी रौशनी शायरी

धूप हे तो कभी चांदनी शायरी

वाह मुस्लिम जलाने लगी हे दिए

फिक्र में आतशीं आपकी शायरी

45

अरशद इकबाल अंजूम, बोकारो, झारखंड, भारत

यह आपके उरूज-ए-तख़य्युल का है कमाल

मुस्लिम सलीम आपके फ़न की नहीं मिसाल

लफ््र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रजों का इन्तिखाब कि मोती जड़े हुए

मतला है लाजवाब तो मकता है लाज़वाल

46

मसूद तन्हा, एडेटर ”फिक्र-ए-नौ“, लाहौर

खूब-तीनत, खूबरू मुस्लिम सलीम

दोसतों की आबरू मुस्लिम सलीम

महफिल-ए-अह्ल-ए-अदब की शान है

तेरी हर इक जुस्तुजू मुस्लिम सलीम

47

ओवैस जाफ़री, वाशिंग्टन

फ़्रिक-ओ-फ़न, लहजा, मआनी, सोत-ओ-आहंग का कमाल

मुस्लिम, इक शायर बड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

48

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

रंग-ए-मुस्लिम से नुमायां है शऊर-ए- क्रि-ओ-फन

वुह सुखनवर इक बड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

जिन का दनिया-ए-अदब में नाम है मुस्लिम सलीम

वुह सुख़नवर इक बड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

रहती हे हरदम अन्हें बेनाम चेहरों की तलाश

राह-ए-उर्दूे में खड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

49

ज़िया शहजाद, कराची

वाह वाह! कैसी अनोखी है यह मुस्लिम की रदीफ़

शेर में मोती जड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

इक नया रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल सीखिए शहज़ाद आप

हम सुख़नवर कब बड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

50

सऊद सिद्दीकी, कराची

काश मैं भी शेर में दाद-ए-सुख़न देता उन्हें

रंग मुस्लिम का अलग है, इत्तिलाअन अर्ज़ है

51

निसार अहमद खां, ओकारा, पाकिसतान

शेर मोती से जड़े हैं इत्तिलाअन अर्ज़ है

दरिया कूज़े में भरे हैं इत्तिलाअन अर्ज़ है

52

अहमद अली खां, रियाज़, साोदी अरबेह

जिनको दुनिया जानती हे, इस्म हे मुस्लिम सलीम

इल्म के अफ़जल धड़े हैं, इत्तिलाअन अर्ज़ है

53

ज़िया रोमानी, करनाटक, भारत

शायर उम्दा और बड़े हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

शेर नश्तर से लगे हें इत्तिलाअन अर्ज़ है

54

ज़िया शहज़ाद, कराची

मुस्लिम हे बड़ा पहले ही से कामत-ओ-कद में

अब और कया ठहराऊं असे मंसब-ओ-हद में

मैं बज़्म-ए-सुख़न में उसे तसलीम करूंगा

आजाऊं बला से किसी इल्ज़ाम की ज़द में

मैं यह नहीं कहता कि बड़ा अह्ल-ए-नज़र है

जो देखे वुह कह देता है इज़हार की मद में

है काम यह मुस्लिम का सुख़न ही से महब्बत

अलझे गा ना हरगिज़ भी वुह तारीफ-ओ-सनद में

जो तंग-नज़र लोग हें मैं उन से लड़ूंगा

शहजाद ना आए कोई भी मेरी मदद में

55

डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी नई देहली, इंडिया

मुस्लिम सलीम शायर-ए-रौशन ज़मीर हैं

अशआर से है उनके अयां असरी हिस्सियत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *